भारतीय दन्त परिषद का इतिहास

 

दन्त चिकित्सा अधिनियम (1948 की धारा 16) भारत में दन्त चिकित्सा व्यवसाय और दन्त चिकित्सा शिक्षा का इतिहास एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह अधिनियम 29 मार्च, 1948 से लागू किया गया और तदनुसार 12 अप्रैल, 1949 को भारतीय दन्त परिषद गठित किया गया।


भारत में दंत चिकित्सा शिक्षा और दंत स्वास्थ्य की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका देने से पूर्व हमारे देश में दंत चिकित्सा विज्ञान के इतिहास का विवरण निम्नलिखित अध्याय में दिया गया है।

 

अतीत में देखें:

 

अतीत में देखने से यह पता चलता है कि प्राचीन काल में भारत शायद विश्व में दंत स्वास्थ्य सेवा के सबसे उन्नत देशों में से एक था। भारत के पुराने आयुर्वेदिक साहित्य में, मानव दांतों के अर्क के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों का विवरण पाया जाता है। साथ ही दांतो की बीमारियों का वर्गीकरण मिलता है। पुराने दिनों में दंत रोगों को 28 प्रकारों में वर्गीकृत किया गया था। दंत क्षय मसूड़ों के रोगों और अन्य दंत रोगों का वर्णन कुछ प्राचीन संदर्भों में बहुत ही स्पष्ट रूप से दिया गया है। उपचार की पंक्तियों का भी उल्लेख किया गया है। मौखिक स्वच्छता का अभ्यास दैनिक अनुष्ठानों में शामिल था। जीभ की सफाई मौखिक स्वच्छता के अभ्यास में शामिल थी। वर्ष 1971-1972 के दौरान पश्चिमी वैज्ञानिकों द्वारा दांतों की सड़न और पीरियडोंटल बीमारी की रोकथाम में जीभ की सफाई के महत्व को सामने लाया गया।

 

प्राचीन शास्त्र जैसे वेद, पुराण, शिलालेख और चित्र तथा हमारे प्राचीन चिकित्सा साहित्य सभी सिद्ध करते हैं कि प्राकृतिक दांतों को स्वस्थ अवस्था में संरक्षित करने का एक व्यवस्थित ज्ञान हमारे प्राचीन द्रष्टाओं को ज्ञात था। दंत चिकित्सा चिकित्सा विज्ञान का एक अभिन्न अंग था।

 

प्राचीन भारतीय ऋषि सुश्रुत को सार्वभौमिक रूप से विश्व के पहले दंत शरीर-रचना विज्ञानी के रूप में स्वीकार किया जाता है। उन्होंने काशी में लगभग 600 ई.पू. वैज्ञानिक रूप से दंत चिकित्सा का शिक्षण प्रदान किया। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने स्वदेशी संज्ञाहरण (एनेस्थिसिया) और स्वास्थ्य लाभ से परिचित होकर कई शल्य चिकित्सा उपकरणों का आविष्कार किया था। उन्होंने उस समय में ज्ञात विभिन्न जड़ी-बूटियों से दवाओं को बनाया और अपने शिष्यों को व्यावहारिक मानव शरीर रचना विज्ञान सिखाया।

 

सुश्रुत के बाद, दंत चिकित्सा विज्ञान को तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता था। शिक्षण के इन प्रसिद्ध स्थानों पर एशिया के विभिन्न भागों से छात्र आते थे। इन प्रसिद्ध संस्थानों में शैक्षणिक अनुशासन कठोर था। छात्रों ने चयनित विषयों में निपुणता प्राप्त करने के लिए अपना समय समर्पित किया। शैक्षिक वर्ष के दौरान उनके प्रदर्शन को उनकी प्रगति के आधार पर आंका गया था।

 

दुर्भाग्यवश ये विश्वविद्यालय लंबे समय तक बने नहीं रह पाए। तक्षशिला विश्वविद्यालय को 450-500 ई. के दौरान हूणों द्वारा नष्ट कर दिया गया और नालंदा विश्वविद्यालय को बख्तियार खिलजी द्वारा 1203 ई. में जला दिया गया। बुद्ध काल में भी दंत शल्य चिकित्सा को बहुत बड़ा झटका लगा था क्योंकि भगवान बुद्ध की शिक्षाओं ने मानव शरीर के विच्छेदन पर रोक लगा दी थी और मृत शरीर या मांस का स्पर्श अपवित्र माना जाने लगा था।

 

बाद में, ब्राह्मण वर्चस्व के दिनों के पश्चात् धार्मिक विचारों की कसौटी और संकीर्णता के साथ शल्य चिकित्सकों को निम्न माना जाने लगा था। आस्था-इलाज, जादू-टोना, मंत्र और नीमहकीमी लोकप्रिय हो गए। इस प्रकार प्राचीन भारत में ब्राह्मणों के विरोध के कारण शल्य चिकित्सा की कला धीरे-धीरे कम हो गई क्योंकि ब्राह्मणों को उन दिनों विभिन्न विज्ञानों को पशु भोजन और बलि की शिक्षा देने का एकाधिकार था जो कि पूर्व-बौद्ध काल में बहुत सामान्य थी। इस विरोधाभास के कारण शल्य चिकित्सक शरीर-रचना संबंधी प्रदर्शनों के लिए आवश्यक शवों को छूने से सकुचाने लगे। वे रक्त, मवाद और अन्य पदार्थों के बारे में भी अनभिग्य रह गए जिन्हें शल्यक्रिया करने के दौरान टाला नहीं जा सकता। पुरोहित जाति द्वारा उपेक्षित की जा रही शल्य क्रिया निम्न वर्ग के हाथों में चली गई जिसका अभ्यास विशुद्ध रूप से अनुभवजन्य था।

 

मुगल काल भी वैज्ञानिक दंत शल्य चिकित्सा के लिए अंधकार का काल बना रहा। इस काल में ऐसे वैद और हकीम लोकप्रिय बने रहे जिन्हें शल्य चिकित्सा का ज्ञान नहीं था। यद्यपि शल्य चिकित्सा में कमी जारी रही लेकिन भारतीय चिकित्सा विज्ञान ने पेशवाओं (1751-1818 ई.) के समय में पुनरुद्धार के कुछ लक्षण दिखाई दिए। बाद में कुछ भारतीय दवाओं पर काम किया गया और इस अवधि के दौरान इस विषय पर ज्यादातर बड़े ग्रंथों का संकलन लिखा गया था।

 

यह कहा जाता है कि अंग्रेज पूर्व धारणा के साथ आए थे कि भारतीय दवाईयां नीम हकीमी थी और इस विषय पर भारतीय निरर्थक भंडार पर काम करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने भारत की चिकित्सा कला को संदेह की दृष्टि से देखा और निस्संदेह एक वरदान के रूप में मेडिकल स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की।

 

यह 19 वीं शताब्दी के आरंभिक भाग में चिकित्सा पद्धति की आधुनिक शिक्षा पर आधारित चिकित्सा शिक्षा की शुरुआत ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा विदेश से आए मेडिकल चिकित्सकों द्वारा कुछ संस्थानों में निर्देश देकर की गई थी। जाहिर है कि उनकी चिकित्सा भारत में तैनात सैनिकों के लिए, कुछ सहायकों या चिकित्सा सहायकों या सरकारी अधिकारियों के लिए ही थी।

 

हालांकि पहली बार वर्ष 1920 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में मेडिकल छात्रों के लिए एक पाठ्यक्रम के विषयों के रूप में दंत चिकित्सा को आरंभ किया गया।19 वीं शताब्दी के दौरान इस क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ।

 

वर्ष 1920 भारत में दंत चिकित्सा शिक्षा में हमारी प्रगति का पहला मील का पत्थर बना। इस वर्ष चिकित्सा विज्ञान की एक अलग शाखा के रूप में दंत शिक्षा को व्यवस्थित करने के लिए पहला ठोस कदम उठाया गया जब कलकत्ता में दिवंगत पद्म भूषण डॉ.रफीउद्दीन अहमद द्वारा पहला पूर्ण स्वायत्त डेंटल कॉलेज स्थापित किया गया जिन्हें दंत चिकित्सा का ग्रैंड ओल्ड मैन और सही मायने में भारत में चिकित्सकीय शिक्षा का जनक माना जाता है।

 

दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के अधिनियमन से पहले दंत चिकित्सा संस्थान

 

डॉ. आर. अहमद द्वारा वर्ष 1920 में कलकत्ता में पहला डेंटल कॉलेज स्थापित किया गया था। कॉलेज की शुरुआत एक साल के डिप्लोमा कोर्स (L.D.Sc.) से हुई थी और वर्ष 1922 में इस पाठ्यक्रम की अवधि दो वर्ष और बढ़ा दी गई। वर्ष 1936-37 में उक्त कॉलेज बंगाल सरकार की राज्य चिकित्सा संकाय से सम्बद्ध था और L.D.Sc. डिप्लोमा पाठ्यक्रमों की अवधि चार वर्ष के लिए बढ़ा दी गई थी। वर्ष 1953 में यह केवल बी.डी.एस डिग्री के लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। डॉ. आर.अहमद स्वामित्व वाले कॉलेज को वर्ष 1949 में पश्चिम बंगाल सरकार को सौंप दिया गया था और डॉ. आर.अहमद की मृत्यु के पश्चात वर्तमान में इस कॉलेज का नाम “डॉ. आर.अहमद दन्त चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल” रख दिया गया।

 

वर्ष 1923 में डॉ. सत्य पाल (जो बाद में स्वतंत्रता के बाद पूर्वी पंजाब विधानमंडल के अध्यक्ष बने) द्वारा डेंटल एंड ऑप्टिकल कॉलेज / पंजाब डेंटल कॉलेज के नाम से एक अन्य दन्त चिकित्सा संस्थान लाहौर (अब पाकिस्तान का भाग है) में शुरू किया गया। यह कॉलेज 1940 के दशक के अंत तक अस्तित्व में रहने के बाद बंद कर दिया गया। डॉ. सत्य पाल देश के लिए स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में अपनी गतिविधियों के लिए अधिकतर समय जेल में रहे। यह कॉलेज किसी बोर्ड या विश्वविद्यालय से संबद्ध नहीं था और इसकी डिप्लोमा योग्यता को केवल वर्ष 1960 में भारतीय दन्त परिषद ने मान्यता दी थी।

 

वर्ष 1926 में कराची में स्थित अमेरिकन डेंटल कॉलेज जिसे बाद में कराची दंत चिकित्सा महाविद्यालय के रूप में जाना गया है को डॉ. एम.के.पटेल द्वारा कराची में शुरु किया गया था, वर्ष 1931 और बाद में वर्ष 1936 में इसे पुनर्गठित किया गया। इस कॉलेज को वर्ष 1947 में देश के विभाजन के बाद सांप्रदायिक उपद्रवों और भारत में डॉ. पटेल के प्रवास के बाद बंद कर दिया गया था। इसकी L.D.Sc. योग्यता केवल 31 दिसंबर 1936 से पहले दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है।

 

वर्ष 1928 में, डॉ.एच.एम राव द्वारा बेजवाड़ा में “आंध्र डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल” के नाम से दन्त संस्थान की स्थापना की गई। वर्ष 1933 में इस संस्थान को अमेरिकन डंटल कॉलेज एवं अस्पताल के रूप में फिर से नामित किया गया और 56 थम्बू चेट्टि स्ट्रीट, मद्रास में स्थापित किया गया जहां यह वर्ष 1947 तक चलाया गया। परंतु इसकी योग्यता को कभी मान्यता नहीं मिली।

 

वर्ष 1932 में कलकत्ता में सिटी डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल नामक एक अन्य कॉलेज शुरू किया गया। वर्ष 1932 से 1940 की अवधि के दौरान लगभग 114 इस संस्थान से योग्यता प्राप्त थे। इस कॉलेज ने भी लाइसेंस प्राप्त (L.D.Sc.) योग्यता प्रदान करने के साथ पाठ्यक्रमों को दो वर्ष बनाया और जिसमें प्रवेश के लिए आवश्यकताएं मैट्रिक परीक्षा थी।यदि किसी भी व्यक्ति ने 31 मार्च 1940 से पहले उस संस्था में दो साल के प्रशिक्षण किया हो या पहले एक दंत चिकित्सक या एक चिकित्सा व्यवसायी के रूप में अभ्यास में लगे हुए हों, उक्त संस्था में एक वर्ष के प्रशिक्षण लिया हो तो इसकी योग्यता को दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के तहत मान्यता दी जाती है।

 

वर्ष 1933 में बाई यमुनाबाई एल.नायर अस्पताल डेंटल कॉलेज को मेडिकल लाइसेंस और स्नातकों के लिए एक वर्षीय पाठ्यक्रम के साथ शुरू किया गया; और अगले वर्ष मैट्रिक के लिए दो वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू किया गया था। अगले वर्ष इसे बढ़ाकर तीन वर्षीय पाठ्यक्रम कर दिया गया और फिर भी अगले साल चार साल के पाठ्यक्रम में L.D.Sc. डिप्लोमा आरंभ किया गया। परीक्षाओं का संचालन नायर अस्पताल डेंटल बोर्ड द्वारा किया जाता था। वर्ष 1946 में, कॉलेज को बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने अपने कब्जे में ले लिया और बॉम्बे यूनिवर्सिटी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक नई बिल्डिंग बनाई गई, जिसे वर्ष 1954 में बी.डी.एस डिग्री कोर्स के लिए संबद्ध कर दिया गया। यह कॉलेज दंत चिकित्सा की सात विशिष्टताओं में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (एम.डी.एस) के लिए प्रशिक्षण भी प्रदान कर रहा है। डॉ. वी.एम देसाई नायर कॉलेज के पहले डीन थे और डॉ. वेरो पी.देसाई और डॉ.एफ.एन वैद सह-संस्थापक थे। इस कॉलेज ने स्वर्गीय डॉ. वी.एम. देसाई के नेतृत्व में तेजी से प्रगति की जिन्होंने वर्ष 1957 में अपनी मृत्यु तक डीन का कार्यभार संभाला।

 

वर्ष 1933 में डी मोन्टमोरेंसी डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल का उद्घाटन लाहौर में डॉ. यू.एस. मलिक और डॉ. एम.एल.वत्स के साथ शिक्षण कर्मचारियों के साथ प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में हुआ है। वर्ष 1936 में इस कॉलेज में पंजाब विश्वविद्यालय में बी.डी.एस डिग्री के लिए ने एक नियमित पाठ्यक्रम आरंभ किया गया और डॉ. सी.डी. मार्शल डे को कॉलेज के डीन के रूप में नियुक्त किया गया। इस कॉलेज को वर्ष 1938 में पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा संबद्धता प्रदान की गई और उसके पश्चात् दंत चिकित्सा का एक अलग संकाय बनाया गया। इस प्रकार डे मोंटमोरेंसी डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल, लाहौर (अब पाकिस्तान का भाग है) को डेंटिस्ट्री में उन्हें पहले डिग्री धारक बनाने का श्रेय दिया जाता है जिन्हें देश के विभाजन से पहले अविभाजित भारत में तत्कालीन पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा बी.डी.सी डिग्री से सम्मानित किया गया था। न केवल यह स्नातक डिग्री प्रदान करने वाला पहला डेंटल कॉलेज है वरन वर्ष 1945 में लाहौर में डे मोंटमोरेंसी डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल द्वारा पहली बार स्नाकोत्तर दन्त चिकित्सा पाठ्यक्रम की विश्वविद्यालय डिग्री से सम्मानित किया गया। परिषद के अध्यक्ष डॉ.के.एल शौरी इस कॉलेज से एम.डी.एस डिग्री प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति हैं। दंत क्षय पर उनका पहला शोध लेख था।

 

स्वतंत्रता के पहले और बाद के युग में डे मोंटमोरेंसी डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल के स्नातकों और स्नातकोत्तरों ने दंत चिकित्सा शिक्षा की प्रगति के लिए एक नाभिक का गठन किया। वर्ष 1938 में दिल्ली में “दिल्ली डेंटल कॉलेज एवं अस्पताल” नामक संस्थान की स्थापना की गई। परंतु दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के अंतर्गत इसकी योग्यता को मान्यता नहीं दी गई और यह अस्तित्व में नहीं रह पाया।

 

1951 में कॉलेज ऑफ फिजिशियन एंड सर्जन ने दंत चिकित्सा में एफ.सी.पी.एस की शुरुआत की। पहले यहां L.D.Sc., सी.पी.एस का पाठ्यक्रम उपलब्ध किया जाता था। दंत शल्य चिकित्सा में लाइसेंस पाठ्यक्रम के लिए पहली परीक्षा का आयोजन दिसंबर 1941 में बॉम्बे के चिकित्सकों और शल्य चिकित्सकों द्वारा आयोजित किया गया था। दिसंबर 1941 से दिसंबर 1954 तक सभी आठ परीक्षाएं आयोजित की गईं और सभी 16 उम्मीदवारों ने उसमें अर्हता प्राप्त की।

 

आरंभ के वर्षों के दौरान, नायर अस्पताल डेंटल कॉलेज और सर कुर्रम्भॉय अब्राहिमजी मेमोरियल डेंटल कॉलेज - कॉलेज ऑफ फिजिशियन और सर्जन बॉम्बे से संबद्ध थे।

 

दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 को बढ़ावा देने वाले कारक

 

इन दंत संस्थानों की स्थापना के अतिरिक्त सरकारी और निजी निकायों द्वारा अन्य प्रयास जैसे प्रांतीय दंत चिकित्सा संघ और ऑल इंडिया डेंटल एसोसिएशन किए गए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कई समितियों को नियुक्त किया गया था जिनमें सबसे प्रमुख "स्वास्थ्य सर्वेक्षण और विकास समिति" है जिसे अक्टूबर 1943 में भारत सरकार द्वारा सर जोसेफ भोर की अध्यक्षता में नियुक्त किया गया था। इस समिति का उद्देश्य स्वास्थ्य के संबंध में तत्कालीन मौजूदा स्थिति का व्यापक सर्वेक्षण करना और स्वास्थ्य शिक्षा और व्यवसाय के आगे विकास के लिए संस्तुति करना था। परंतु रिपोर्ट को आगे ले जाने से पहले और देश में दन्त शिक्षा, दन्त स्वास्थ्य सेवाओं और दंत चिकित्सा व्यवसाय विनियमन के स्वरूप को आकार देने में इसकी भूमिका को जानने से पहले इस दिशा में किए गए पहले के कुछ प्रयासों को रिकॉर्ड करना काफी स्वाभाविक होगा, हालांकि देश में उचित दंत चिकित्सा शिक्षा और दंत स्वास्थ्य सेवाओं की सख्त जरूरत पर ध्यान देने में बहुत प्रभावी नहीं है लेकिन निश्चित रूप से सहायक है।

 

डॉ. आर.अहमद द्वारा वर्ष 1925 में आरंभ की गई इंडियन डेंटल जरनल और डॉ. एम.के.पटेल द्वारा वर्ष 1927 में आरंभ की गई इंडियन डेंटल रिव्यू नामक दोनों पत्रिकाओं का अपना प्रभाव था। इन दो पत्रिकाओं ने वैज्ञानिक दंत चिकित्सा और नैतिक अभ्यास की आवश्यकता पर चर्चा के लिए एक अच्छा मंच प्रदान किया। इन पत्रिकाओं ने निश्चित रूप से तत्कालीन दंत सर्जनों के बीच भागीदारी की भावना को उत्पन्न किया।

 

वर्ष 1934 में, बंगाल की तत्कालीन सरकार ने 'दंत चिकित्सा शिक्षा और पंजीकरण जांच समिति' नामक एक समिति की नियुक्ति की, जिसने दंत चिकित्सा अधिनियम के एक मानक पाठ्यक्रम और अधिनियमन की संस्तुति की गई। तदनुसार बंगाल दंत चिकित्सा अधिनियम 1937 में पारित किया गया था और दंत चिकित्सा में परीक्षा बंगाल के राज्य चिकित्सा संकाय द्वारा आयोजित की गई थी।

 

वर्ष 1936 में डॉ. एम. के. पटेल द्वारा सिंध के तत्कालीन प्रांत के लिए एक दंत चिकित्सा अधिनियम का मसौदा तैयार कर तत्कालीन सिंध (अब पाकिस्तान का भाग है) सरकार को सौंप दिया। वर्ष 1937 में, बॉम्बे प्रेसीडेंसी डेंटल समिति ने बॉम्बे के तत्कालीन प्रांत के लिए एक दंत चिकित्सा अधिनियम भी तैयार किया और 1940 में उन्होंने जनसंख्या के दंत स्वास्थ्य की आवश्यकताओं के बारे में राज्य सरकार का ध्यान केंद्रित करने के लिए डॉ. एस.पी. कपाड़िया की अध्यक्षता में दंत चिकित्सा शिक्षा का शताब्दी समारोह भी आयोजित किया।

 

इसी प्रकार पंजाब डेंटल संघ द्वारा पंजाब प्रांतीय डेंटल बोर्ड के गठन के लिए एक मसौदा कानून भी प्रस्तावित किया गया।

 

डॉ. एस. के. मजूमदार ने अखिल भारतीय दंत चिकित्सा संघ के गठन के लिए संबंधित सभी लोगों की राय जानने के लिए और सभी संबंधित सह-संचालन को सुरक्षित करने के लिए व्यावहारिक रूप से पूरे भारत का दौरा किया।

तदनुसार, ऑल इंडिया डेंटल समिति का गठन 1946 में नई दिल्ली में उसके मुख्यालय के साथ किया गया था। डॉ. आर. अहमद को (डॉ. एस. के. मजूमदार के साथ) पहले अध्यक्ष के रूप में चुना गया और डॉ. एन.एन. बेरी को समिति के पहले मानद महासचिव के रूप में चुना गया। ए.आई.डी.ए द्वारा मसौदा दंत चिकित्सा अधिनियम तैयार किया गया और सम्मति के लिए इसकी सभी शाखाओं में परिचालित किया गया। समिति की ओर से डॉ. एन.एन. बेरी ने भारत सरकार को अधिनियम का मसौदा प्रस्तुत किया और उक्त विधेयक का सक्रियता से पालन किया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः दंत चिकित्सा अधिनियम बना।
जैसा कि पहले कहा गया था, सबसे प्रभावी साधन जो वास्तविक विराम के माध्यम से लाया गया था, वह भोर समिति की रिपोर्ट थी। यह एक उच्च शक्ति समिति थी और इसमें सभी प्रकार के मतों, व्यवसायों, विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों का प्रतिनिधित्व किया गया था। समिति को एक नई अवधारणा लाने और स्वास्थ्य शिक्षा और सेवाओं के सभी दिशाओं में व्यावहारिक रूप से एक बड़ी उछाल का श्रेय दिया जाता है और यदि कोई दंत चिकित्सा के दिग्गजों जैसे कि डॉ. सी.डी. मार्शल, डॉ. आर.अहमद और डॉ. वी.एम.देसाई को उनकी समझ, व्यावहारिक सोच और दूरदर्शिता के लिए दंत धारा समिति के लिए उचित श्रेय नहीं देता है तो अपने सही परिप्रेक्ष्य में घटनाओं को रिकॉर्ड करने में विफल हो जाएगा। बाद के घटनाक्रमों ने संदेह से परे साबित कर दिया है कि दंत चिकित्सा शिक्षा और दंत स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में जो कुछ भी किया गया है और हासिल किया गया है उसमें इन अग्रदूतों द्वारा सुझाए गए "रूपरेखा और दिशानिर्देश" के बाहर कुछ भी नहीं है और जिसने अंत में देश के "दंत सुधार" को गति दी है।

 

दंत चिकित्सा शिक्षा, दंत स्वास्थ्य सेवाओं और दंत चिकित्सा पेशे के संबंध में तत्कालीन स्थिति का सर्वेक्षण करते हुए, भोर, समिति ने संक्षेप में कहा था: -

 
  • दन्त चिकित्सा व्यावहारिक रूप से सभी भारतीय विश्वविद्यालयों में अध्ययन के उपेक्षित विषय में से एक है।
  • शायद ही दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण के लिए सुविधाएं उपलब्ध हों।
  • वह दंत शल्य चिकित्सक जो भारत में अभ्यास करते हैं, विशाल बहुमत में केवल अमीरों का इलाज करते हैं। गरीबों के लिए व्यावहारिक रूप से दन्त चिकित्सा का कोई प्रावधान नहीं है और राज्य नियंत्रण के तहत पूरे देश में अस्पतालों में दंत चिकित्सकों को बहुत सीमित सीमा तक नियोजित किया जाता है।
  • पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित दन्त शल्य चिकित्सकों की अत्यधिक कमी है।
  • दंत चिकित्सा का व्यवसाय भारत में लगभग पूरी तरह से असंगठित है और इसके नियमन के लिए कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।
 

भोर समिति पूरे मामले में काफी गहराई तक जा चुकी थी और उसने कई सिफारिशें की थीं, उनमें से कुछ को संक्षेप में यहां प्रस्तुत किया गया है:

 

1. तीन प्रकार के डेंटल कर्मियों के लिए प्रावधान किया जाए:

 
  • दन्त शल्य चिकित्सा
  • डेंटल हाइजीनिस्ट
  • डेंटल मेकेनिक
 

2. 25 डेंटल कॉलेजों को प्रत्येक में 100 प्रवेशों के साथ स्थापित किया जाए और प्रत्येक कॉलेज को 100 डेंटल हाइजीनिस्ट और डेंटल मैकेनिक्स की आवश्यक संख्या के प्रशिक्षण में सक्षम हो।

 

3. निर्देशों के पाठ्यक्रम आदि जो सभी दंत महाविद्यालयों में अनुकरण किए जाते हैं, उन्हें मानकीकृत किया जाए।

 

4. दंत शल्य चिकित्सा निष्णात की डिग्री के संस्थापन हेतु सभी विश्वविद्यालयों में प्रावधान किया जाए।

 

5. डेंटल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि और दंत शल्य चिकित्सक और हाइजीनिस्टों के प्रशिक्षण में सुधार तब तक संतोषजनक परिणाम नहीं देगा जब तक कि राज्य स्वयं जनसंख्या की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए एक व्यापक दंत चिकित्सा सेवा की स्थापना नहीं करता है। दस साल की अवधि के भीतर लागू किए जाने वाले एक अल्पकालिक उपाय के रूप में समिति ने दंत चिकित्सालयों की स्थापना की सिफारिश की थी:

 
  • माध्यमिक इकाई मुख्यालय में (सभी में 139) तत्कालीन उपलब्ध 500 बिस्तर अस्पताल के साथ संलग्न किए जाएं।
  • प्रत्येक 200 बिस्तर अस्पताल (सभी में 216) के साथ किए जाएं।
  • प्रत्येक माध्यमिक इकाई (सभी में 710) के लिए एक चलनशील दंत संगठन उपलब्ध किया जाए।
 

6. दंत व्यवसाय के लिए विधायी उपाय लागू किए जाए और केंद्रीय और प्रांतीय दन्त परिषद बनाई जाए। बाद में इस वयवसाय के लिए अनुशासनात्मक नियमों के साथ प्रशिक्षण संस्थानों, दंत चिकित्सा रजिस्टरों की योग्यता और रखरखाव को मान्यता देने का उत्तरदायित्व दिया जाए। भोर समिति की ये महत्वपूर्ण सिफारिशें थीं जिन्होंने अंततः दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के अधिनियमित होने और दंत चिकित्सा परिषद के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।

 

दंत चिकित्सा अधिनियम, 1948 के समक्ष भारतीय दन्त परिषद

 

दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 का अधिनियमन देश में दंत चिकित्सा शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। अधिनियम ने 'दंत चिकित्सा व्यवसाय के नियमन और उस उद्देश्य के लिए दन्त परिषद के गठन’ का प्रावधान किया।

 

तत्कालीन वायसराय और उनके मंत्रिमंडल ने वर्ष 1947 में दंत चिकित्सकों के विधेयक पर अपनी सहमति दी और उसके बाद इस विधेयक को व्यापक रूप से जनता की राय और बड़ी बहस के बाद लागू किया गया। परस्पर विरोधी मतों के मद्देनजर, बिल को भारत की संविधान सभा द्वारा अपनी प्रवर समिति को भेजा गया था। इस समिति में राजकुमारी अमृत कौर, श्री एम.एल चट्टोपाध्याय, श्री देशबंधु गुप्ता, श्री एल.कृष्णस्वामी भारती, श्री वी. सुब्रह्मण्यम, श्रीमती डी. दुर्गाबाई, श्री पी. कुन्धिरमन, श्री एच.इमाम, श्री यशवंत राय और श्री राम नारायण सिंह शामिल थे। प्रवर समिति ने 28 जनवरी, 1948 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और इसे 25 फरवरी, 1948 को संविधान सभा के समक्ष रखा गया। तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री माननीय राजकुमारी अमृत कौर ने बिल को प्रायोगिक रूप से लागू करते हुए कहा था कि "विधेयक के सिद्धांत निर्विवाद हैं और इसके लिए किसी वकालत की आवश्यकता नहीं है।" लेकिन बिल पर दो दिनों तक पूरी तरह से बहस हुई और संविधान सभा के सदस्यों द्वारा रखे गए संशोधनों के एक अंक के बाद, बिल 26 फरवरी 1948 को पारित किया गया और 29 मार्च, 1948 को भारत के राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त की। अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, भारत सरकार द्वारा जारी एक विशेष अधिसूचना द्वारा भारतीय दन्त परिषद का गठन 12 अप्रैल, 1949 को किया गया था।

 

दंत चिकित्सा अधिनियम, 1948 के विभिन्न प्रावधानों के तहत परिषद को दिए गए कार्यों और कर्तव्यों की जांच करना पसंद कर सकते हैं, तभी उपलब्धियों और विफलताओं का सही आकलन किया जा सकता है।

 

अधिनियम केंद्र में एक दंत परिषद तथा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राज्य दंत परिषदों के गठन का प्रावधान करता है। जबकि केंद्र में भारतीय दन्त परिषद दंत व्यवसाय के कल्याण की देखभाल करने के लिए और देश में दंत चिकित्सा शिक्षा के उचित समान मानकों को बनाए रखने के उद्देश्य के लिए समग्र निकाय है। राज्य दन्त परिषद मुख्य रूप से दंत चिकित्सकों, दंत स्वच्छता विशेषज्ञता और दंत यांत्रिकी के पंजीकरण के रखरखाव और इसके कारण उत्पन्न होने वाले मामलों के लिए उत्तरदायी हैं।

 

देश में दन्त चिकित्सा शिक्षा के मानकों को विनियमित करने के प्रयोजनों से दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 द्वारा दंत चिकित्सा परिषद (1) को दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (एम.डी.एस), दंत चिकित्सा में स्नातक पाठ्यक्रम (बी.डी.एस), डेंटल हाइजीनिस्ट पाठ्यक्रम और दंत चिकित्सा यांत्रिकी पाठ्यक्रम जैसे दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों को प्रदान करने वाले प्रत्येक दंत चिकित्सा संस्थान का निरीक्षण करने का कार्य सौंपा गया है। इस उद्देश्य के लिए निरीक्षकों को नियुक्त करने की शक्तियां परिषद की कार्यकारी समिति में निहित हैं। दूसरा, भारतीय दन्त परिषद को भारत सरकार द्वारा भारतीय नागरिकों और विदेशी दंत योग्यता के लिए मान्य या अमान्य करने की संस्तुति करने की शक्तियों के साथ निहित किया गया है जो अधिनियम में संलग्न तीन अनुसूचियों में से किसी में भी निर्दिष्ट नहीं की जा सकती है। तीसरा, भारतीय दन्त परिषद उक्त अधिनियम की धारा 34 के तहत परिकल्पित दो वैधानिक परीक्षाओं के लिए परीक्षा निकाय है। यह अधिनियम दंत चिकित्सा परिषद को भारत की दंत चिकित्सा योग्यता की मान्यता के लिए पारस्परिक योजना के निपटारे के लिए विदेश में संबंधित अधिकारियों के साथ बातचीत करने के लिए अधिकृत करता है।

 

केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति से भारतीय दन्त परिषद को दंत चिकित्सा में विभिन्न पाठ्यक्रमों जैसे एम.डी.एस, बी.डी.एस, डेंटल हाइजीनिस्ट्स, और डेंटल मैकेनिक्स के लिए विनियम और पाठ्यक्रम को निर्धारित करने के साथ एकरूपता सुनिश्चित करने और देश में दंत शिक्षा के मानक को बनाए रखने का उत्तरदायित्व दिया गया है।
भारतीय दन्त परिषद को दन्त शल्य चिकित्सकों को उनके व्यवसायिक व्यवहार के लिए आचार संहिता की शक्ति प्रदान की गई है। उपरोक्त के अतिरिक्त भारतीय दन्त परिषद को अखिल भारतीय दंत चिकित्सक रजिस्टर को बनाए रखने का काम सौंपा गया है। इस रजिस्टर को राज्य दंत चिकित्सकों के रजिस्टरों के आधार पर भारतीय दन्त परिषद द्वारा बनाए रखा जाए और वर्णमाला क्रम में संकलित किया जाए।

 

पहले पाँच वर्षों के लिए, अधिनियम ने यह व्यवस्था दी कि परिषद के अध्यक्ष को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाए।
तदनुसार, स्वास्थ्य सेवा के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. के.सी.के.ई. राजा अपनी सेवानिवृत्ति की तिथि 17.09.1952 तक परिषद के पहले नामित अध्यक्ष थे। लेफ्टिनेंट कर्नल के.सी.के. लक्ष्मणन जो डॉ. राजा के समक्ष स्वास्थ्य सेवा के महानिदेशक के रूप में सफल हुए, उन्हें तब परिषद के अध्यक्ष के रूप में नामित किया गया था।

 

डॉ. आर. अहमद परिषद के पहले निर्वाचित अध्यक्ष थे जिन्हें 5.11.1954 को परिषद द्वारा चुना गया था। उन्होनें कर्नल एन.एन.बेरी के समक्ष सफलता प्राप्त की जो वर्ष 1949 में अपनी स्थापना के बाद से परिषद के उपाध्यक्ष थे। कर्नल एन.एन.बेरी को सबसे पहले 7.11.1959 को अध्यक्ष के रूप में चुना गया था और बाद में 6.8.1962 को फिर से चुना गया और अगस्त 1967 तक वे अध्यक्ष के पद पर बने रहे। इन वर्षों के दौरान परिषद द्वारा जो कुछ भी पूरा किया गया है, उसके लिए कर्नल बेरी मुख्य रूप से सहायक रहे हैं।

 

परिषद के अध्यक्ष डॉ. के.एल. शौरी को 28.8.1967 को पहली बार चयनित किया गया और 24.11.1969 को पुन: चयनित किया गया। परिषद के अध्यक्ष के रूप में उनका चुनाव परिषद के इतिहास में एक ओर मोड़ साबित हुआ क्योंकि इसने स्वतंत्र रूप से स्थिति का जायजा लेने का अवसर प्रदान किया। पहले पाँच वर्षों के लिए केंद्र सरकार द्वारा: (1) डॉ. जी.डी. माथुर (2) श्री बी.एस. रायज़ादा और (3) श्री बी.डी. शर्मा को परिषद के सचिवों के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके पश्चात् वर्ष 1956 में (4) कैप्टन एस. ब्राट को परिषद के सचिव के रूप में चयनित किया गया। वे वर्ष 1971 में सेवानिवृत हुए। (5) श्री डी.एन. चौहान ने वर्ष 1962 से सहायक सचिव के रूप में परिषद में शामिल हुए।

 

14 मई 1949 को परिषद की पहली बैठक का उद्घाटन करते हुए, स्वर्गीय राजकुमारी अरनितकौर ने कहा था- " वास्तव में, दंत चिकित्सा परिषद को प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रम की इस उचित दिशा और नियंत्रण में, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए।" पिछले 23 वर्षों के इतिहास से पता चलता है कि परिषद ने अपने उद्घाटनकर्ता की इच्छाओं को विश्वसनीयता से निभाया है।

 

देश में दंत चिकित्सा शिक्षा के विकास में परिषद की भूमिका

 
(क.) पाठ्यक्रम:
 

दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 द्वारा परिषद को इस कार्य का उत्तरदायित्व दिया गया है:
- दंत चिकित्सक, दंत स्वच्छता विशेषज्ञ/ डेंटल हाइजीनिस्ट, डेंटल मैकेनिस्ट और इस तरह के प्रशिक्षण की शर्तों के प्रशिक्षण के लिए मानक पाठ्यक्रम का निर्धारित करना;
- परीक्षाओं के मानकों का वर्णन करना और अधिनियम के तहत योग्यता मान्यता के लिए सुरक्षित करने के लिए संतुष्ट होने के लिए अन्य आवश्यकताएं

 

इन्हें प्राप्त करने के लिए, निम्न आवश्यकताएँ हैं:
तकनीकी और नैदानिक आवश्यकताओं के पाठ्यक्रम मानकों की एकरूपता, परीक्षाओं के मानक;
दंत चिकित्सा में विभिन्न पाठ्यक्रमों में प्रवेश का एक समान मानक;
एक विश्वविद्यालय के लिए प्रत्येक दन्त चिकित्सा महाविद्यालय की संबद्धता;
सभी दन्त संस्थानों का पर्यावेक्षण यह सुनिश्चित करने के लिए पर्यवेक्षण कि वे निर्धारित मानकों को बनाए रखें;
दंत चिकित्सा व्यवसाय विनियमन।

 

अत: परिषद द्वारा स्वाभाविक रूप से इन आवश्यकताओं को पूरा करना पहला कार्य था। मई, 1949 में डॉ. यू.एस. मलिक, डॉ. आर. अहमद, डॉ. एम.एल. वॉट्स, डॉ. जी. वी. देसाई और मेजर आई.एम. मनचंदा की एक समिति को बी.डी.एस पाठ्यक्रमों के लिए न्यूनतम बुनियादी आवश्यकताओं एवं दंत शिक्षा और विनियमों तथा पाठ्यक्रम के मानकों को पूरा करने के लिए नियुक्त किया गया था।
फरवरी 1950 में दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 की धारा 34 के तहत परिकल्पित प्रशिक्षण और परीक्षाओं अर्थात् दन्त चिकित्सा रजिस्टर के भाग “ख” में पंजीकरण के लिए योग्यता परीक्षा और भाग “ख” से “क” में स्थानांतरण के लिए पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए एक अन्य समिति नियुक्त की गई जिसमें मेजर आई.एम. मनचंदा, डॉ. वी.एम. देसाई, डॉ. रूप नारायण, डॉ. एम.एल. वत्स, डॉ. कृष्णा और डॉ. आर. प्रकाश को शामिल किया गया।

 

उसी समय एक अन्य समिति जिसमें डॉ. आर. कृष्णा, डॉ. यू.एस. मलिक, डॉ. जी.वी. देसाई, डॉ. एम.एल. वत्स और लेफ्टिनेंट कर्नल आई. एम. मनचंदा को डेंटल हाइजीनिस्ट्स और डेंटल मैकेनिक्स के पाठ्यक्रम और विनियम देने के लिए नियुक्त किया गया था। इन रिपोर्टों के तैयार होने और विचार करने के बाद और संबंधित राज्य सरकारों और विश्वविद्यालयों से परामर्श कर चार साल के बी.डी.एस पाठ्यक्रम, दो साल के डेंटल मैकेनिक्स प्रशिक्षण और एक साल के डेंटल हाइजीनिस्ट पाठ्यक्रम के लिए मसौदा विनियम और पाठ्यक्रमों को स्वास्थ्य मंत्रालय में भारत सरकार को सौंपे गए। इस पर आगे विचार के बाद और स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के परामर्श से दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 की धारा 20 के अंतर्गत इन पाठ्यक्रमों को स्वीकृति दी गई।

 

इन पाठ्यक्रमों को समय-समय पर दंत चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव, वैज्ञानिक विकास और नवीनतम रुझानों के प्रकाश में परिषद द्वारा संशोधित किया गया है। बी.डी.एस पाठ्यक्रम के लिए विनियमों और पाठ्यक्रमों को संशोधित करने वाली पहली समिति अक्टूबर, 1957 में नियुक्त की गई थी जिसमें डॉ. के.एल. शौरी, डॉ. एच.डी. मर्चेंट, डॉ. यू.एस. मलिक, डॉ. टी.एन. चावल और डॉ. एम.जी. राव शामिल थे। उनकी रिपोर्ट पर परिषद ने मार्च 1962 में विचार किया और हमेशा की तरह राज्य सरकारों और विश्वविद्यालयों से परामर्श के बाद वर्ष 1963 में सरकार द्वारा उसे स्वीकृत कर दिया गया। इसके पश्चात परिषद द्वारा फिर से एक समिति जिसमें डॉ. टी.एन. चावला, डॉ. बी.आर. वच्छेर, डॉ. एम.एस.एन. गिनवाला, डॉ. एस.रामचन्द्र और डॉ. आर.पी. लाल को डेंटल कॉलेज के लिए स्टाफिंग पैटर्न और प्रत्येक श्रेणी के डेंटल शिक्षकों के लिए योग्यता और अनुभव आदि की समीक्षा करने के लिए नियुक्त किया गया। समिति द्वारा संशोधित मानदंडों को परिषद द्वारा संशोधित किया गया है और बाद में राज्य सरकारों और विश्वविद्यालयों के साथ सामान्य परामर्श के बाद भी 17 सितंबर, 1971 से लागू दंत चिकित्सा अधिनियम -1948 की धारा 20 के अंतर्गत भारत सरकार द्वारा अनुमोदित किया गया।

 

बी.डी.एस पाठ्यक्रम के भाग के रूप में सामाजिक दंत चिकित्सा के पाठ्यक्रम भी विकसित किए गए हैं। परिषद को दन्तक चिकित्सा के क्षेत्र में नवीनतम रुझानों और वैज्ञानिक विकास के प्रकाश में संपूर्ण बी.डी.एस पाठ्यक्रम को संशोधित करने और नए सामाजिक व्यवस्था और अवधारणा की वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के प्रश्न में घेर लिया गया है।

 

परिषद द्वारा वर्ष 1968 में डेंटल हाइजीनिस्ट और डेंटल मैकेनिक्स पाठ्यक्रम में संशोधन करने के लिए डॉ. वी. सुब्रमण्यन और डॉ. एम. जी. राव को शामिल कर एक समिति नियुक्त की गई। इस समिति की रिपोर्ट को वर्ष 1969 में परिषद के समक्ष रखा गया जब इसे एक अन्य व्यापक आधारित समिति द्वारा जांच के लिए भेजा गया जिसमें परिषद के अध्यक्ष, डॉ. के.एल. शौरी, डॉ. टी.एन. चावला, डॉ. वाई. सी. चावला और डॉ. एस.डी. शर्मा के सह-चयनित सदस्य ब्रिगेडियर मुल्क राज शामिल थे। दूसरी समिति की रिपोर्ट पर परिषद में गहन चर्चा हुई और राज्य सरकारों एवं विश्वविद्यालयों के साथ विचार विमर्श के पश्चात भारत सरकार को संशोधित पाठ्यक्रम सौंप दिए गए। दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 की धारा 20 के अंतर्गत आवश्यक रूप में सरकार की स्वीकृति प्राप्त हुई है, परंतु क्योंकि अब प्रस्तावित बदलाव प्रमुख हैं और डेंटल हाइजीनिस्ट के लिए पाठ्यक्रमों की अवधि एक वर्ष की जगह दो वर्ष कर दी गई है अत: दंत चिकित्सा यांत्रिकी के लिए संशोधित पाठ्यक्रम का शैक्षिक सत्र 1973-74 और डेंटल हाइजीनिस्ट के लिए शैक्षिक सत्र 1974-75 से संचालित होगा।

 

परिषद द्वारा निर्धारित अन्य पाठ्यक्रम की परिकल्पना दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 की धारा 34 और सार्वजनिक स्वास्थ्य दंत चिकित्सा प्रमाण-पत्र/ डिप्लोमा पाठ्यक्रम के अंतर्गत की गई है जो परीक्षा I और II से संबंधित हैं ।

 
(ख.) महाविद्यालय
 

देश के विभाजन के पश्चात् भारत में केवल तीन दंत चिकित्सा महाविद्यालय - 1. नैयर अस्पताल दन्त चिकित्सा महाविद्यालय, बॉम्बे 2. सर सी.ई.एम. दन्त चिकित्सा महाविद्यालय, बॉम्बे 3. कलकत्ता दन्त चिकित्सा महाविद्यालय, कलकत्ता रह गए थे । इसमें से केवल बॉम्बे स्थित सर सी.ई.एम दन्त चिकित्सा महाविद्यालय 4 वर्ष के बी.डी.एस पाठ्यक्रम के लिए बॉम्बे विश्विद्यालय से संबंद्ध था और और अन्य दोनों महाविद्यालयों को केवल LDSc/LDS की लाइसेंस योग्यता प्रदान की गई।

 

देश में दंत चिकित्सा शिक्षा के लिए न्यूनतम बुनियादी मानक के रूप में चार साल के बी.डी.एस पाठ्यक्रम के निर्धारित होने से लाइसेंस पाठ्यक्रम को समाप्त कर दिया गया।

 

हालांकि विश्वविद्यालय स्वतंत्र और स्वायत्त निकाय हैं, परंतु भारतीय दंत परिषद ने दंत चिकित्सा में योग्यता को मान्यता देने या मान्यता न देने की संस्तुति करने की शक्ति प्राप्त करने के बाद देश में दंत चिकित्सा शिक्षा के विकास पर बहुत सकरात्मक प्रभाव डाला है। परिषद ने अधिनियमन एवं पाठ्यक्रम के अतिरिक्त देश के सभी दंत चिकित्सा संस्थानों में चलाए जा रहे विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए स्टाफ़, आवास, उपकरण आदि के संबंध में विस्तृत मानक आवश्यकताओं को भी निर्धारित किया गया है।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति और दन्त चिकित्सा अधिनियम 1948 के लागू होने के पश्चात् वर्ष 1949 में लखनऊ में पहले दंत चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना की गई। इसके पश्चात् वर्ष 1953 में मद्रास, वर्ष 1956 में पटियाला, वर्ष 1963 में बैंगलौर, त्रिवेंद्रम और हैदराबाद, वर्ष 1963 में अहमदाबाद, वर्ष 1966 में मनिपाल और वर्ष 1968 में नागपुर में दंत चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना की गई। योजना-वार, पहली पंचवर्षीय योजना अवधि से पहले दंत चिकित्सा महाविद्यालयों की संख्या चार थी। पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान तीन दंत चिकित्सा महाविद्यालयों, दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान चार दंत चिकित्सा महाविद्यालयों और तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान दो दंत चिकित्सा महाविद्यालयों की स्थापना की गई। तीसरी पंचवर्षीय योजना के पश्चात दो वर्षों के दौरान और चौथे पंचवर्षीय योजना के आरंभ में दो दंत चिकित्सा महाविद्यालयों की स्थापना की गई। चौथी पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान किसी डेंटल कॉलेज की स्थापना नहीं की गई।

 

चार साल के संस्थागत बी.डी.एस डिग्री पाठ्यक्रम के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों से 15 दंत चिकित्सा महाविद्यालय संबद्ध थे। बॉम्बे, कलकत्ता और गुजरात के विश्वविद्यालयों मंि चिकित्सकीय संकायों का भी गठन किया गया है। उन 15 दंत चिकित्सा महाविद्यालय में से 12 राज्य सरकारों द्वारा वित्तपोषित और संचालित हैं और शेष तीन का संबंध इस प्रकार है: (1) मुम्बई स्थित नायर अस्पताल दंत चिकित्सा महाविद्यालय को बॉम्बे नगर निगम द्वारा वित्त और प्रशासनिक रूप से नियंत्रित किया जाता है; (2) दंत चिकित्सा लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा महाविद्यालय लखनऊ का वित्त पोषण और संचालन किया जाता है (3) मणिपाल स्थित दंत चिकित्सा महाविद्यालय को कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज ट्रस्ट एंड एकेडमी ऑफ जेनरल एड्यूकेशन द्वारा संचालित किया जाता है - जो कि ग्रामीण क्षेत्र में स्थित एकमात्र दंत चिकित्सा महाविद्यालय है।

 

डेंटल हाइजीनिस्ट कोर्स के प्रशिक्षण के लिए सशस्त्र बल मेडिकल कॉलेज, पूना (वर्ष 1963 से); दंत चिकित्सा महाविद्यालय, त्रिवेंद्रम (वर्ष 1963 से); गवर्नमेंट दंत चिकित्सा महाविद्यालय, बॉम्बे (वर्ष 1967 से); डेंटल विंग, मद्रास मेडिकल कॉलेज, मद्रास (वर्ष 1967 से); पंजाब गवर्नमेंट दंत चिकित्सा महाविद्यालय, अमृतसर (वर्ष 1967 से और अब बंद है) और दंत चिकित्सा महाविद्यालय, बैंगलोर (वर्ष 1971 से) में सुविधाएं शुरू की गई हैं।

 

डेंटल मैकेनिक्स के लिए प्रशिक्षण की सुविधाएं गवर्नमेंट दंत चिकित्सा महाविद्यालय, बॉम्बे और दंत चिकित्सा महाविद्यालय लखनऊ, त्रिवेंद्रम, मद्रास और बैंगलोर में उपलब्ध हैं और कक्षा I और II दंत तकनीशियन पाठ्यक्रमों के लिए सुविधाएं सशस्त्र बलों में उपलब्ध हैं।

 

भारतीय दंत परिषद द्वारा निरंतर अनुमोदन के माध्यम से परीक्षार्थी बोर्ड द्वारा डेंटल हाइजीनिस्ट और डेंटल मैकेनिक के लिए परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं।

 

वर्ष 1967 में, दंत शल्य चिकित्सकों के बीच रोजगार के अवसरों की कमी और बेरोजगारी की बढ़ती दर को ध्यान में रखते हुए, भारतीय दंत परिषद ने सिफारिश की थी कि कोई भी नया दंत चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित न किया जाए और मौजूदा दंत चिकित्सा महाविद्यालय में प्रवेश की संख्या में वृद्धि न की जाए। अत: तब से कोई भी नया दंत चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित नहीं किया गया है और दिल्ली, वाराणसी, पांडिचेरी, जयपुर, श्रीनगर और उड़ीसा में प्रस्तावित दंत चिकित्सा महाविद्यालयों की योजनाओं को लंबित रखा गया है।

 
(ग.) निरीक्षण:
 

परिषद का सबसे महत्वपूर्ण कार्य स्थापन के पश्चात शिक्षण सुविधाओं और परीक्षाओं का निरीक्षण करना है। इन निरीक्षणों का उद्देश्य मुख्य रूप से दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के अंतर्गत दंत चिकित्सा योग्यता की मान्यता पर विचार करना है। संस्थानों की योग्यता को मान्यता दिए जाने के बाद भी निरीक्षण किया जा सकता है और उनके मानक का पता लगाया जा सकता है ताकि परीक्षा की मानक के साथ-साथ शिक्षण सुविधाएं भी संतोषजनक स्तर पर बनी रहें। इस तरह, परिषद ने सभी दंत चिकित्सा महाविद्यालय और स्नातकोत्तर विभागों के साथ-साथ डेंटल हाइजीनिस्ट्स और डेंटल मैकेनिक्स पाठ्यक्रम का भी कम से कम दो या उससे अधिक बार निरीक्षण किया है। निरीक्षकों को स्टाफ, आवास, भवन, उपकरण, पुस्तकालय, शिक्षण सहायक, संग्रहालय और छात्रावास सुविधाओं एवं परीक्षाओं के मानक के संबंध में उपलब्ध सुविधाओं के बारे में अन्य बातों के साथ विस्तार में रिपोर्ट करना आवश्यक है। परिषद द्वारा इन रिपोर्टों पर बहुत अच्छी तरह से विचार किया जाता है और कमियों को संबंधित अधिकारियों अर्थात् संबंधित विश्वविद्यालय एवं राज्य सरकार के ध्यान में लाया जाता है और विशिष्ट स्थितियों में आवश्यक कार्रवाई की जाती है।

 

यह वे निरीक्षण हैं जो भारतीय दंत चिकित्सा परिषद के अधिकार को स्थापित करने के मुख्य कारक रहे हैं और जिससे देश में दंत चिकित्सा शिक्षा के मानकों की वृद्धि में काफी सहायता मिली है।

 

दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा

 
(क.) विशेषताएं: -
 

पिछले दशक में देश में दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा की स्थिति में काफी बदलाव देखा गया है। इससे पहले, जैसा कि भोर समिति ने देखा कि "दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए सुविधाएं शायद ही मौजूद थीं"। जैसा कि ऊपर बताया गया है चालीस के दशक में लाहौर स्थित डी मोनोमोरेंसी कॉलेज ऑफ डेंटिस्ट्री द्वारा दन्त चिकित्सा में संस्थागत स्नाकोत्तर (MDS) डिग्री प्रदान की गई थी और स्वतंत्रता के बाद के इस कॉलेज के इन्हीं पोस्ट-ग्रेजुएट विद्यार्थियों द्वारा दंत चिकित्सा शिक्षा की उन्नति के लिए नाभिक का गठन किया गया। देश के विभाजन (1947) के समय विभाजित भारत में एम.डी.एस पाठ्यक्रम प्रदान करने वाला कोई संस्थान नहीं था।

 

भोर समिति ने प्रस्तावित किया कि प्रशिक्षित शिक्षकों की तीव्र कमी को देखते हुए सभी स्नातकों को उच्चतम डिग्री प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और एम.डी.एस पाठ्यक्रम स्थापित करने के लिए सभी विश्वविद्यालयों में प्रावधान किए जाएं जिससे भारत में धीरे-धीरे टीचर्स ऑफ डेंटिस्ट्री के एक प्रशिक्षित कैडर को बनाया जा सकता है। एक अस्थायी उपाय के रूप में, भोरे समिति ने आगे सुझाव दिया कि 'दंत चिकित्सा स्नातकों को दंत चिकित्सा शिक्षा के आधुनिक रुझानों का अध्ययन करने और विशेष विषयों के प्रशिक्षण के पाठ्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए विदेशों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए ताकि भारत में वापिस आने पर उन्हें पेशेवर नियुक्तियां मिल सकें। हालांकि इस प्रक्रिया में कुछ उम्मीदवारों का निजी अभ्यास में जाना पसंद किया जाना और केवल मानद या अंशकालिक क्षमता में शिक्षण संस्थानों / अस्पतालों में काम करने का विकल्प चुनना बाधा साबित हुआ। इसके अलावा, अन्य देशों में बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को भेजना संभव नहीं था क्योंकि स्नातकोत्तर प्रशिक्षण के लिए प्रवेश प्राप्त करना आसान नहीं था और उन्नत देशों में स्नाकोत्तर की शिक्षा की लागत बहुत अधिक थी।

 

इन सभी कारकों और भारत में दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा आरंभ करने का महत्व पर ध्यान देने के बाद वर्ष 1959 में भारतीय दन्त परिषद ने विनियमों और स्नाकोत्तर डिग्री पाठ्यक्रमों के लिए विस्तृत पाठ्यक्रम निर्धारित किया और केंद्र सरकार को उसी की कुल लागत का 75% हिस्सा वहन करने के लिए सहमत कर लिया। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की स्थापना के लिए विश्वविद्यालयों का भी अनुसरण किया गया।

 

परिषद द्वारा दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए नौ विशिष्टताएँ निर्धारित की गई हैं: -

  • प्रोस्थेटिक दंत चिकित्सा
  • मौखिक शल्य चिकित्सा
  • संचालन दंत चिकित्सा
  • दंत संशोधन
  • पीरियोडोन्टिया
  • मौखिक निदान और दंत चिकित्सा रेडियोलॉजी
  • डेंटल पैथोलॉजी एंड बैक्टीरिया
  • पेडोडोंटिया और निवारक दंत चिकित्सा
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य दंत चिकित्सा

 

*पेडोडोंटिया और निवारक दंत चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य दंत चिकित्सा में एम.डी.एस पाठ्यक्रम को क्रमशः 1963 और 1971 में निर्धारित किया गया था।

 

बी.डी.एस पाठ्यक्रम के भाग के रूप में सामाजिक दंत चिकित्सा के पाठ्यक्रमों को भी विकसित किया गया है। परिषद, दन्त चिकित्सा के क्षेत्र में नवीनतम रुझानों और वैज्ञानिक विकास के प्रकाश में पूरे बी.डी.एस पाठ्यक्रम को संशोधित करने और नए सामाजिक व्यवस्था और अवधारणा की वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के प्रश्न से घिरी हुई है।

 

वर्ष 1959 में पहली बार बॉम्बे स्थित दो दंत चिकित्सा महाविद्यालयों - गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, बॉम्बे और नायर हॉस्पिटल डेंटल कॉलेज में उपरोक्त में से सात विशेषताओं के साथ स्नाकोत्तर विभागों को स्थापित किया गया। कर्नल एन.एन बेरी (परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष के रूप में) और डॉ. के.एल. शौरी (गवर्नमेंट डेंटल कॉलेज, बॉम्बे के तत्कालीन डीन) नें बॉम्बे में एम.डी.एस पाठ्यक्रमों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 

दंत चिकित्सा की विभिन्न विशिष्टताओं में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम लखनऊ, अमृतसर, त्रिवेंद्रम, बैंगलोर, मद्रास, अहमदाबाद और मणिपाल के डेंटल कॉलेजों में भी उपलब्ध थे। यहां तक कि मैसूर विश्वविद्यालय के नेतृत्व में अब दंत चिकित्सा में पी.एच.डी और डी.एस.सी जैसे डॉक्टरेट पाठ्यक्रमों के लिए पंजीकरण शुरू किया गया है। अनुसंधान कर्ताओं और शिक्षकों के लिए व्यापक और गहन अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्देश्य से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली की तर्ज परविधिवत रूप से सुसज्जित और उचित रूप से संचालित एक दंत शिक्षण अनुसंधान संस्थान की स्थापना की आवश्यकता है।

 
(ख.) पुनश्चर्या पाठ्यक्रम:
 

पहले, पचास प्रतिशत से अधिक अभ्यास करने वाले दंत चिकित्सक ऐसे थे जो मान्यता प्राप्त दंत शिक्षण संस्थानों से कोई औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नहीं थे। दंत चिकित्सा में उनके अभ्यास और सिद्धांत को अद्यतन करने के लिए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम का रास्ता निकाला गया। इन पाठ्यक्रमों ने दंत चिकित्सा के बदलते रुझान और विषयों में नवीन प्रगति के साथ दंत चिकित्सकों को अवगत किया है। परंतु अभी तक इस दिशा में कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाया गया है। वर्ष 1966-67 के दौरान केंद्र सरकार द्वारा सामान्य मैडिकल चिकित्सकों हेतु पुनश्चर्या पाठ्यक्रम की व्यवस्था के लिए 75,000 रुपये की राशि आवंटित की गई थी और समान राशि बाद में भी अंकित की गई थी, परंतु दंत चिकित्सकों के पुनश्चर्या पाठ्यक्रम के लिए कोई धनराशि प्रदान नहीं की गई।

 
(ग.) दंत अनुसंधान:

हालांकि, परिषद ने दंत चिकित्सा में स्नातकोत्तर शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी परंतु परिषद अब तक देश में दन्त चिकित्सा अनुसंधान को उचित मान्यता और आगे बढ़ाने में सक्षम नहीं थी। भारतीय दन्त चिकित्सा संघ और गिब्ब्स, लिवर ब्रोस. आदि जैसे कॉमर्शियल हाउसेज़ द्वारा लघु परियोजनाओं के लिए अनुदान प्रदान किया गया। परंतु भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की दंत अनुसंधान सलाहकार समिति के गठन ने देश के विभिन्न डेंटल कॉलेजों में विभिन्न दंत चिकित्सा शोध परियोजनाओं को सक्रिय रूप से व्यवस्थित और स्वीकृत करके इसका पूरे देश में दूर-दूर तक प्रसार किया जिसने दंत चिकित्सा शोध के क्षेत्र में क्रांति की लहर ला दी। यहां पी.एल 480 निधि को विशेष उल्लेख की आवश्यकता है क्योंकि दंत चिकित्सा में अधिकांश बड़ी शोध परियोजनाओं को इसके द्वारा वित्तपोषित किया गया था।

 

हालांकि भारतीय दन्त परिषद ने देश में प्रकाशित सभी शोध पत्रों का एक संकलन तैयार किया है जो कि भारतीय दन्त परिषद के पुस्तकालय में उपलब्ध है।

 

दन्त चिकित्सकों का पंजीकरण

 

भोर समिति ने अवलोकन किया कि:

 

" देश में एक विज्ञान के रूप में दंत चिकित्सा की प्रगति की गति तब तक धीमी रहेगी जब तक कि इसे अनिवार्य पंजीकरण और अपरिहार्य व्यक्तियों द्वारा अभ्यास पर निषेध के उपयुक्त कानून द्वारा निर्देशित न किया जाए।"

 

दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के प्रावधानों के अंतर्गत राज्य दन्त चिकित्सा परिषद मुख्य रूप से दंत चिकित्सकों, डेंटल हाजीनिस्टों और डेंटल मैकेनिस्टों के पंजीकरण और इससे संबंधित मामलों के अनुरक्षण के लिए उत्तरदायी है। भारतीय दन्त परिषद को अखिल भारतीय दंत चिकित्सक, पंजिका को बनाए रखने का काम सौंपा गया है। भारतीय दन्त परिषद द्वारा पंजिका को विभिन्न राज्य दन्त परिषद से समय-समय पर प्राप्त राज्य दंत चिकित्सकों के पंजिका के आधार पर वर्णमाला क्रम में संकलित किया जाता है। पहली भारतीय दंत चिकित्सक पंजिका को वर्ष 1952 में भारतीय दन्त परिषद द्वारा संकलित और मुद्रित किया गया था और तब से इस तरह के दंत चिकित्सक पंजिकाओं और उनके पूरक की एक श्रृंखला प्रकाशित की जा रही है जिसमें निरंतर सभी दंत चिकित्सकों के संबंध में रिकॉर्ड को अद्यतन रखा जाता है। किसी भी राज्य / केंद्र शासित प्रदेश में दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 लागू होने पर प्रत्येक दंत चिकित्सक का पंजीकरण होना अनिवार्य है। पंजीकरण के बिना दंत चिकित्सा का अभ्यास करना दंत चिकित्सा अधिनियम 1948 के अंतर्गत अपराध और दंडनीय है। एक दंत चिकित्सक को न केवल एक बार पंजीकरण लेना है, बल्कि हर वर्ष संबंधित राज्य दंत चिकित्सा परिषद द्वारा इस उद्देश्य के लिए निर्धारित शुल्क का भुगतान कर अपने पंजीकरण को नवीनीकृत करना होगा। ऐसा न करने पर उसका नाम राज्य दन्त चिकित्सा पंजिका से हटा दिया जाएगा। हालांकि राज्य दन्त चिकित्सक पंजिका से हटाए गए नाम को नवीकरण शुल्क के साथ दंड शुल्क का भुगतान कर पुन: दर्ज करवाया जा सकता है। यदि एक दंत चिकित्सक अपने पंजीकरण के बाद किसी भी अतिरिक्त मान्यता प्राप्त दंत चिकित्सा योग्यता को प्राप्त करता है, तो वह उस योग्यता को निर्धारित शुल्क के भुगतान कर राज्य दन्त चिकित्सक पंजिका में अपने नाम के समक्ष जोड़ सकता है। संबंधित राज्य दंत चिकित्सा परिषदों द्वारा पूरे भारत में निर्गमित ऐसे सभी भुगतान का एक-चौथाई हिस्सा केंद्रीय निकाय - भारतीय दंत परिषद को देय है।

 

राज्य दंत चिकित्सा परिषदों को डेंटल हाइजीनिस्ट और डेंटल मैकेनिक्स के लिए पंजिका तैयार करने का अधिकार भी प्राप्त है। अब तक पंजाब, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, मद्रास, मैसूर, केरल और दिल्ली में डेंटल हाइजीनिस्ट और डेंटल मैकेनिक्स के ऐसी पंजिकाएं तैयार की गई हैं। इन राज्यों / केंद्र शासित प्रदेशों में पंजीकृत डेंटल हाइजीनिस्ट और डेंटल मैकेनिक्स की संख्या क्रमशः 585 और 712 है।

 

आचार संहिता

 

दंत चिकित्सा के व्यवसाय का विनियमन करने के लिए केवल पंजीकरण पर्याप्त नहीं है इसलिए भारत सरकार के पूर्व अनुमोदन के साथ ही दंत चिकित्सा परिषद ने भी दंत चिकित्सकों के लिए विस्तृत 'आचार संहिता' लागू कर दी है, जिसे सभी राज्य दन्त चिकित्सा परिषदों द्वारा अपनाया गया है। यह ‘संहिता’ देश में दंत चिकित्सा के अनैतिक अभ्यास पर एक बड़ी नियंत्रक साबित हुई है, हालांकि अनैतिक अभ्यास की जाँच करने के लिए उचित मशीनरी की अनुपस्थिति में, यहां बहुत कुछ वांछित है जिससे यह अपराध असंज्ञेय हो गया है।

 

दन्त चिकित्सा स्वास्थ्य सेवाएं-एवं-दंत श्रमशक्ति

 

स्वतंत्रता-पूर्व भारत में दंत व्यवसाय व्यावहारिक रूप से बिल्कुल भी संचालित नहीं हो पा रहा था। ऐसा नहीं था कि जनसंख्या समूह दंत रोगों से पीड़ित नहीं था। स्वतंत्रता से पहले किए गए दंत सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 40-60 प्रतिशत बच्चे दंत क्षय से पीड़ित थे। स्कूली बच्चों में मैलोक्लूज़ काफी सामान्य था और मौखिक कैंसर भी आम तौर पर पाया जाता था। इसके अतिरिक्त पीरियडोंटल बीमारियां बहुत आम थीं। 90% से अधिक वयस्क पीरियडोंटल बीमारी से पीड़ित थे। दंत चिकित्सा के क्षेत्र में योग्य व्यक्तियों की अनुपस्थिति में कुछ ऐसे अयोग्य व्यक्ति थे जो बहुजनों का अनुचित लाभ उठाते थे। कोई भी अयोग्य व्यक्ति दंत चिकित्सा कार्य करने लगता था।

 

अत: किसी भी दन्त चिकित्सा श्रम-शक्ति आवश्यकताओं का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय संसाधनों के परमिट के आधार पर सभी नागरिकों को जल्द से जल्द आवश्यक एवं इच्छित दंत स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाना है जिससे व्यक्ति विशेष और राष्ट्र का स्वास्थ्य सबसे बेहतर हो सके। इस कार्यक्रम को सुस्पष्ट परिभाषित उद्देश्यों के आधार पर डिजाइन किया जाए। इसके द्वारा उन चरणों को निर्धारित किया जाए जिन्हें उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपनाना है और उनके कार्यांवयन के लिए एक समय सीमा को निर्धारित किया जाए। यह प्रगति की आवधिक समीक्षा और मूल्यांकन के लिए भी प्रदान किया जाए जिसे बदलती परिस्थितियों और लक्ष्यों को पूरा करने हेतु समायोजन का अवसर प्रदान करने के लिए बनाया गया है। जनसंख्या और उसकी वृद्धि दर, जनसंख्या का वितरण - शहरी और ग्रामीण, प्रतिव्यक्ति आय, जनसंख्या का शैक्षिक स्तर और दंत रोगों के पैमाने और व्यापकता सार्वभौमिक रूप से वे कारक जिन्हें किसी भी देश के लिए दंत जनशक्ति का आकलन करने के लिए ध्यान में रखा जाता है।

 

इन कारकों, उपलब्ध राष्ट्रीय संसाधनों और दंत चिकित्सा कर्मियों के मौजूदा स्टॉक के ज्ञान के साथ भौगोलिक स्थानों द्वारा उनके वितरण के आधार पर दंत चिकित्सक के लिए जनसंख्या का एक आवश्यक / वांछित अनुपात स्थापित किया गया है। दंत स्वास्थ्य समस्याओं की गहरी जानकारी (जो राज्य से राज्य में भिन्न होता है) दंत श्रमशक्ति का आकलन करने के लिए प्राथमिक रूप से आवश्यक है जो जनसमूह की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों द्वारा अनुकूलित है।

 

संभवत: इन कारकों द्वारा निर्देशित और हमारे देश में प्रचलित स्थानीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए, भोर समिति (1945) ने दंत चिकित्सा सेवाओं के विस्तार की आवश्यकता को महसूस करते हुए माना कि "दंत चिकित्सा शिक्षा के प्रस्तावित विस्तार का उद्देश्य केवल निजी प्रेक्टिशनर उपलब्ध करना नहीं है बल्कि राज्य दंत चिकित्सा सेवाओं के लिए कर्मियों को भी उपलब्ध करना है जो उस विशाल जनसंख्या की दंत चिकित्सा की आवश्यकताओं पूर्ति कर सके जो पूरी तरह से उपेक्षित है”। अत: उन्होंने संस्तुति की - " हमारा प्रयास है कि सभी जिला अस्पतालों के दंत चिकित्सा भागों में अल्पावधि दंत चिकित्सा कार्यक्रम आरंभ किया जाए और इस प्रकार के सभी जिला अस्पतालों में एक मोबाइल डेंटल वैन उपलब्ध की जाए।" भोर समिति की राय सही थी कि डेंटल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि से तब तक संतोषजनक परिणाम नहीं मिलेंगे जब तक कि राज्य स्वयं जनसंख्या की तत्काल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक व्यापक दंत चिकित्सा सेवा की स्थापना का कार्य नहीं किया जाता।

 

भारतीय दन्त परिषद और भारतीय दंत चिकित्सा समिति द्वारा मुदलियार कमेटी (1956) को एक संयुक्त ज्ञापन में यह सिफारिश की गई थी कि तीसरी पंचवर्षीय योजना के अंत में, भारतीय दन्त परिषद द्वारा प्रस्तावित 500 स्कूल डेंटल क्लीनिकों को खोला जाए और जब तक कि देश में 20 वर्षों की अवधि में 5000 क्लीनिक स्थापित नहीं हो जाते, तब तक अधिक से अधिक स्कूल और अन्य डेंटल क्लीनिक खोले जाए। ऐसा कहा गया कि “अंतिम विश्लेषण में हम एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य स्कीम की योजना बनाएं जिससे देश की पूरी जनसंख्या के लिए नि: शुल्क चिकित्सकीय उपचार उपलब्ध की जा सके।

 

उस समय देश की जनसंख्या लगभग 547 मिलियन और पंजीकृत दंत चिकित्सकों की कुल संख्या लगभग 5500 थी। जनसंख्या के लिए दंत चिकित्सकों के अनुपात के संबंध में भोर समिति की सिफारिशें 1: 4000 के लिए थीं जबकि भारतीय दन्त परिषद द्वारा अनुशंसित इष्टतम स्तर 1: 30,000 है। भारत की जनसंख्या के लिए दन्त चिकित्सकों के इस अनुपात को दन्त परिषद के इष्टतम स्तर तक पहुंचने के लिए कम से कम 15000 अतिरिक्त दन्त चिकित्सकों की आवश्यकता है। दरअसल, पंजीकृत दंत चिकित्सकों की कुल संख्या 5500 है और जिन राज्यों में पंजीकरण नहीं हुआ है उनमें काम कर रहे अन्य 2250 अपंजीकृत दंत शल्य चिकित्सकों सहित देश में दन्त चिकित्सकों की संख्या 7,750 हो सकती है।

 

यह व्यापक रूप से महसूस किया जा रहा है कि तीन पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान दंत स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया है। इसका कारण ढूढंना अब दूर नहीं है। संबंधित अधिकारियों द्वारा कुल रुग्णता और मृत्यु दर के एक प्रमुख हिस्से के लिए लेखाकिंत संचारी रोगों के साथ दंत चिकित्सा देखभाल के लिए निधि आवंटित की गई थी और इन निवारक कार्यक्रमों के लिए उसे उपयोग किया गया - जबकि यहां चिकित्सकीय व्यवसाय और परिषद के संरक्षक दर्शक बने रहे।

 

पहली योजना के दौरान डेंटल क्लीनिकों के लिए 1 करोड़ रुपये की राशि निश्चित की गई थी, लेकिन कोई क्लीनिक नहीं खोले गए। दूसरी योजना में जिला अस्पतालों में 324 डेंटल क्लीनिक (प्रत्येक जिला अस्पताल में एक) का प्रस्ताव किया गया परंतु 70 से अधिक क्लीनिकों को मंजूरी नहीं दी गई। तीसरी योजना में जिला और तहसील अस्पतालों में डेंटल क्लीनिक के अतिरिक्त 500 स्कूल डेंटल क्लीनिक स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। परंतु जिला अस्पतालों में कोई स्कूल डेंटल क्लीनिक नहीं खोला गया और शायद ही 20 से 30 अतिरिक्त डेंटल क्लीनिक स्थापित किए गए। देश में कम से कम 200 जिले हैं जहां दंत चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात 1: 1 लाख से अधिक है और 40 से 50 जिलों में दंत चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात 1: 5 से 20 लाख से अधिक है।

 

देश में दंत चिकित्सा देखभाल के मौजूदा प्रावधानों की संक्षिप्त समीक्षा से यह स्पष्ट हो जाता है कि लोगों की दंत चिकित्सा की आवश्यकताओं का कुछ ही हिस्सा पूरा हो रहा है। हाल ही के अन्वेषण से पता चला है कि हमारी आबादी का 95% से अधिक भाग पीरियडोंटल बीमारियों से ग्रस्त है और 85% से अधिक भाग दंत क्षय से पीड़ित है। हमारे देश में कैंसर के कारण होने वाली कुल मृत्यु में से 30% लोगों की मृत्यु 'मौखित कैंसर' के कारण होती हैं। यह महत्वपूर्ण स्थिति है कि दंत चिकित्सा के लिए जनता के बीच तीव्र मांग है और दंत शल्य चिकित्सकों के बीच अत्यधिक बेरोजगारी है। परिषद के द्वारा वर्ष 1967, 1968, 1969 और अप्रैल 1970 तक अर्हता प्राप्त करने वाले दंत चिकित्सकों को प्रश्नावली भेजी गई जिसमें यह ज्ञात हुआ कि उत्तर देने वाले 583 दंत चिकित्सा स्नातकों मे से 221 (38.9%) स्नातक बेरोज़गार थे। नए दंत चिकित्सा स्नातकों के बीच बेरोजगारी का कारण उपकरणों की उपलब्धता में कमी और भारी मौद्रिक निवेश है जो एक निजी व्यवसाय की स्थापना में किया जाता है। वर्ष 1967 से ही भारतीय दन्त परिषद ने गंभीरता से इस स्थिति का जायजा लिया और दन्त स्वास्थ्य सेवाओं के विकास और सुधार के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाने के साथ ही विभिन्न राज्य सरकारों के साथ मिलकर सख्ती से इस मामले पर अनुसरण किया और कुछ हद तक केंद्र और राज्यों में स्वास्थ्य प्रशासकों के बीच दंत स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के बारे में जागरूक किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य परिषद और योजना आयोग ने भारतीय दंत परिषद के साथ सहमति व्यक्त करते हुए स्वास्थ्य के लिए चौथी पंचवर्षीय योजना में शामिल किया कि “राष्ट्र के दंत स्वास्थ्य के उचित संरक्षण के लिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि स्कूली बच्चों और वयस्क आबादी के लिए चौथी योजना अवधि में बड़े पैमाने पर दंत स्वास्थ्य सेवाएं शुरू करने के लिए पर्याप्त जोर दिया जाए।“

 

हालांक, परिणाम बहुत संतोषजनक नहीं है, परंतु काफी आशाप्रद हैं। देश में दंत चिकित्सालयों की कुल संख्या 300 (वर्ष 1967) से बढ़कर लगभग 700 हो गई है। राज्य सरकारों द्वारा अब दंत स्वास्थ्य आवश्यकताओं पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। मैसूर में 41 दन्त चिकित्सा क्लीनिक स्वीकृत किए गए और वर्ष 1972 से होने के लिए अनुसूचित हैं; उत्तर प्रदेश में प्रति वर्ष 7 क्लीनिकों के चरणबद्ध कार्यक्रम पर 35 दन्त चिकित्सा क्लीनिक खोले जाने हैं; मध्य प्रदेश लगभग 40 नए क्लिनिक खुलने जा रहे हैं। हरियाणा सरकार ने 33 डेंटल क्लिनिक खोले हैं। अधिकांश राज्यों में, मुदलियार समिति की सभी जिला अस्पतालों में डेंटल क्लिनिक रखने के उद्देश्य को प्राप्त कर लिया गया है।जम्मू एवं कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में जिला अस्पतालों के अतिरिक्त कई अन्य डेंटल क्लीनिक अन्य अस्पतालों में खोले गए हैं। चौथी योजना अवधि के दौरान विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा डेंटल क्लीनिक खोलने के लिए बिहार को 15 लाख रुपए, मध्य प्रदेश को 15 लाख रुपए, मैसूर को 27.25 लाख रुपए, आंध्र प्रदेश को 5 लाख रुपए, महाराष्ट्र को 2.5 लाख रुपए, दिल्ली को 5 लाख रुपए, गोवा को 2.5 लाख रुपए, गुजरात को 10 लाख रुपए, तमिलनाडु को 11.5 लाख रुपए की धनराशि आवंटित की गई थी। इसके अतिरिक्त, भारतीय दंत परिषद द्वारा राज्यों से अनुरोध किया गया है कि प्रत्येक राज्य और केंद्र में भी दंत चिकित्सा सेवा की देखभाल के लिए एक अलग सेल बनाए जाएं।