प्रकार्य

 

भारतीय दन्त परिषद की स्थापना संसद के एक अधिनियम, दन्त चिकित्सा अधिनियम, 1948 (1948 की धारा-16) के अंतर्गत की गयी है जो दन्त चिकित्सा शिक्षा, दन्त चिकित्सा व्यवसाय और दन्त चिकित्सा नैतिकता को विनियमित करने की दृष्टि से मार्च 1949 में अस्तित्व में आयी थी।


यह परिषद – केंद्र सरकार, राज्य सरकार, विश्वविद्यालयों, दन्त चिकित्सा कॉलेजों, भारतीय चिकित्सा परिषद और दन्त चिकित्सकों के निजी प्रैक्टिशनर का प्रतिनिधित्व करने वाले 6 निर्वाचन क्षेत्रों से बनी है। कार्यकारी समिति और आम सभा – स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक पदेन सदस्य हैं।


परिषद सदस्यों में से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और कार्यकारी समिति के सदस्यों का चयन चयन करती है। निर्वाचित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, कार्यकारिणी समिति के पदेन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होते हैं।


कार्यकारी समिति इस संगठन की संचालक समिति है जो परिषद की सभी प्रक्रियात्मक, वित्तीय और दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों और स्थितियों का ध्यान रखती है।


दन्त परिषद को विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा दी जाने वाली डेंटल डिग्री के लिए उत्तरदायित्व के साथ-साथ दन्त शिक्षा के समान मानकों को बनाए रखने का उत्तरदायित्व भी प्रदान किया गया है। अपने कार्यों और जिम्मेदारियों के निर्वहन में, परिषद विभिन्न दन्त चिकितसा संस्थानों का निरीक्षण करती है और उपयुक्त उपचारात्मक कार्रवाई हेतु संबंधित अधिकारियों के ध्यान में आने वाली कमियों को सामने लाती है।


दन्त चिकित्सा कॉलेजों या स्नातकोत्तर दन्त चिकित्सा विभाग की स्थापना से पहले इसे कर्मचारियों, उपकरणों, भवनों आदि के संबंध में अनिवार्य रुप से कुछ न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। इन पूर्व-आवश्यकताओं के बिना यह सुनिश्चित करना कठिन है कि इन संस्थानों में शामिल होने वाले छात्र निर्धारित मानक के दन्त चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम हों। वास्तव में छात्रों की योग्यता की मान्यता इन पूर्वापेक्षाओं को पूरा करने पर निर्भ्रर है।


नए दन्त चिकित्सा पाठ्यक्रमों को शुरु करने वाले शैक्षणिक संस्थानों के उच्च मानकों को बनाए रखने के उद्देश्य से यह अनुरोध किया जाता है कि राज्य / केंद्र शासित प्रदेश सरकारों और विश्वविद्यालयों द्वारा कृपया यह सुनिश्चित किया जाए कि:-

  • किसी भी दन्त चिकित्सा कॉलेज को तब तक काम शुरु करने की अनुमति नहीं दी जाती जब तक कि भारतीय दन्त परिषद निरीक्षणों या अन्य माध्यम से यह सुनिश्चित न कर ले कि शिक्षण कर्मचारी, उपकरण, बिल्डिंग इत्यादि परिषद द्वारा निर्धारित तथा केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित न्यूनतम आवश्यकताओं के अनुरुप हैं; और
  • किसी भी दन्त संस्थान को स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को तब तक आरंभ करने की अनुमति नहीं है जब तक भारतीय दन्त परिषद निरीक्षणों या अन्य माध्यम से यह सुनिश्चित न कर ले कि बी.डी.एस पाठ्यक्रमों से संबंधित शिक्षण कर्मचारी, उपकरण इत्यादि न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी तरह से प्रदान की गई हैं और स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रमों के लिए शिक्षण कर्मचारी, उपकरण आदि भारतीय दन्त परिषद और केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित न्यूनतम आवश्यकता के अनुरुप हैं।